कोहली को बधाई लेकिन गावस्कर, बेदी और गांगुली की बात ही निराली थी

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टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली को बधाई..उन्होंने आस्ट्रेलिया में वो कर लिया, जो अब तक किसी भारतीय टीम ने नहीं किया था। लेकिन मैं ये अब तक नहीं समझ पाया हूं कि इसके पीछे कोहली की कप्तानी का योगदान था या उनकी टीम या फिर आस्ट्रेलिया की सबसे कमजोर टीम का..लेकिन ये ऐसी जीत जरूर है तो सिर गर्व से ऊंचा करती है।
भारतीय टीम ने पहली बार 1948 से आस्ट्रेलिया का दौरा शुरू किया था। 70 सालों में टीम इंडिया टेस्ट सीरीज खेलने के लिए 12वीं बार आस्ट्रेलिया गई थी। मुझको व्यक्तिगत तौर पर ये लगता है कि इससे पहले तीन बार आस्ट्रेलिया के दौरे पर गईं भारतीय टीमें इससे बेहतर थीं, वो इतिहास रच सकती थीं, ये वो दौर था जब आस्ट्रेलिया की बेहतरीन टीमें मैदान में थीं। खासकर 1980-81 की वो सीरीज जब भारतीय टीम सुनील गावस्कर की अगुवाई में वहां तीन टेस्टों की सीरीज खेलने गई थी और सीरीज 1-1 से बराबर करके लौटी थी। तब आस्ट्रेलिया टीम के कप्तान ग्रेग चैपल थे और उस टीम डेनिस लिली, ज्योफ थामसन, ज्योफ मार्श, चैपल जैसे दिग्गज थे। बल्कि यूं कह लीजिए ये वो आस्ट्रेलिया टीम थी, जिसके सभी 11 क्रिकेटर लीजेंड थे। इसके बाद सौरव गांगुली की कप्तानी में जब हम 2003-04 में खेलने गए तब आस्ट्रेलिया की टीम को अपराजेय टीम माना जाता था। वो लगातार जीत का परचम फहराती जा रही थी। वो दुनिया की नंबर वन टीम थी। इस समय हम टेस्ट रैंकिंग में नंबर वन हैं और आस्ट्रेलिया पांचवें नंबर की टीम।

मैं फिर लेकिन शब्द का इस्तेमाल करना चाहूंगा, क्योंकि मुझे इन तीनों भारतीय टीमों और कप्तानों से ज्यादा आस्ट्रेलिया गई जिस टीम ने प्रभावित किया है वो थी 1977-78 में बिशन सिंह बेदी की कप्तानी में गई भारतीय टीम, जिसने बॉब सिंपसन वाली आस्ट्रेलिया टीम के खिलाफ सीरीज को 3-2 से गंवाया जरूर लेकिन उसने पहली बार आस्ट्रेलिया को बुरी तरह उसी की जमीन पर पटखनी दी। ये भी कहना चाहिए ये टीम कुछ दुर्भाग्यशाली थी अन्यथा सीरीज का रिजल्ट उसके पक्ष में 4-1 से नजर आने वाला था। दरअसल उस सीरीज के पहले दो टेस्ट जो भारतीय टीम ने गंवाए थे, उसमें उसकी हार का अंतर 16 रन और दो विकेट से था। तीसरे टेस्ट में बेदी की टीम ने आस्ट्रेलिया को 222 रनों और फिर चौथे टेस्ट में एक पारी और दो रन से बुरी पटखनी दी। विशेषज्ञ खुद मान रहे थे भारतीय टीम की तुलना में आस्ट्रेलिया की टीम बहुत फीका खेल रही है। ये भी कहा गया कि घर के अंपायरों ने भी थोड़ा बहुत साथ आस्ट्रेलिया का दे दिया। पांचवें टेस्ट में आस्ट्रेलिया फिर एडीलेड के पांचवें टेस्ट को 47 रन से जीत ले गई। इस भारतीय टीम में एक से बढ़कर एक दिग्गज थे। हर दिग्गज की अपनी कहानियां थीं। उसमें बिशन सिंह बेदी से लेकर सुनील गावस्कर, इरापल्ली प्रसन्ना, वेंकटराघवन, दिलीप वेंगसरकर, मदनलाल, महेंद्र अमरनाथ, बीएस चंद्रशेखर, गुंडप्पा विश्वनाथ, ब्रजेश पटेल और सैयद किरमानी भारतीय टीम में शामिल थे। वो ऐसा समय था जब बेदी, प्रसन्ना औऱ चंद्रशेखर की स्पिनर तिकड़ी की तूती पूरी दुनिया में बोल रही थी। इसका चौथा कोण वेंकटराघवन बन चुके थे। वैसे वो जिस आस्ट्रेलियाई टीम के खिलाफ खेलने पहुंचे थे, वो आमतौर पर कुछ पुराने और नए क्रिकेटरों को मिक्स करके बनाई गई थी, क्योंकि आस्ट्रेलिया टीम के ज्यादातर बड़े सितारे कैरी पैकर की वर्ल्ड सीरीज में खेलने के लिए चले गए थे। इसके बाद भी आस्ट्रेलिया टीम ने भारतीय टीम से डटकर मुकाबला किया। हालांकि कहना चाहिए कि भारतीय टीम के सामने जीत के खासे अवसर थे।

हालांकि मैंने जिस सीरीज की रेडियो कमेंट्री अपने बचपन के दिनों में सुनी थी वो 80-81 की सीरीज थी। जब रेडियो पर कान लगे होते थे। भारतीय टीम भी उम्दा क्रिकेटरों वाली थी और आस्ट्रेलिया टीम तो शायद सबसे बेहतरीन एकादश थी। सिडनी के पहले टेस्ट में आस्ट्रेलिया ने भारत को एक पारी और चार रनों से बुरी तरह पीटा। हालांकि कपिलदेव ने पांच विकेट लेकर शानदार बॉलिंग की थी लेकिन ग्रेग चैपल की डबल सेंचुरी ने सारा खेल बिगाड़ दिया। एडिलेड के दूसरे टेस्ट में दोनों टीमें रंग में थीं. संदीप पाटिल ने 174 रन ठोंककर समां बांध दिया था। उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार में खेल मंत्री चेतन चौहान उन दिनों नर्वस नाइंटीज के मामले में विख्यात थे। उस टेस्ट में वो फिर अपना विकेट 97 रन पर दे आए थे लेकिन वाकई संदीप ने जो बल्लेबाजी तब की, मुझको नहीं लगता कि उसके बाद कोई भारतीय बल्लेबाज वैसा आस्ट्रेलिया में खेल पाया है। लिली, हॉग, यार्डले, पास्को, वाल्टर्स जैसे गेंदबाज उनके सामने पानी मांग रहे थे। वैसे कभी-कभी लगता है कि संदीप पाटिल जैसे शानदार क्रिकेटर को भारतीय क्रिकेट में और लंबा खेलना था लेकिन बॉलीवुड में एक्टिंग ने उनका फोकस खत्म कर दिया। वो टीम में लौटे जरूर लेकिन लय बिगड़ चुकी थी। ये टेस्ट ड्रा रहा। असली रोमांच तीसरे टेस्ट में आया।

ये तीसरे या चौथे दिन की बात है। ये फरवरी में सुबह नौ या दस बजे की बात रही होगी। दूसरी पारी में गावस्कर और चौहान 165 रनों की भागेदारी कर चुके थे। पूरा भारत उनकी बल्लेबाजी पर बल्लियों उछल रहा था। गावस्कर बहुत उम्दा बैटिंग कर रहे थे। 70 रन पर थे तभी डेनिस लिली की एक गेंद उनके पैड से लगी। ना केवल गेंद पहले गावस्कर के बैट से पहले लगी थी, बल्कि गेंद विकेट से दूर भी थी, लेकिन जब एलबीडब्ल्यू की अपील पर अंपायर ने आउट की अंगुली उठाई तो पहली बार रेडियो पर कमेंटेटर को ये कहते सुना गया कि गावस्कर इस फैसले से खासे नाराज हो गए हैं। कुछ देर वो विकेट से हिले ही नहीं और जब हिले तो चौहान को भी अपने साथ मैदान के बाहर लेकर जाने लगे। वैसे हमें तो बचपन में यही लगा कि गावस्कर ने सही किया है, विरोध ऐसा ही होना चाहिए लेकिन किसी तरह भारतीय टीम के मैनेजर दौड़े आए। समझाया बुझाया। टीम फिर बल्लेबाजी के लिए चली गई। लेकिन इस घटना ने कुछ किया हो या नहीं किया, भारतीय टीम में एक गजब का जोश जरूर पैदा किया।

भारतीय टीम 324 रन बनाकर जब दूसरी पारी में आउट हुई तो चौथे दिन के चाय का समय खत्म हो चुका था। आस्ट्रेलिया को मैच जीतने के लिए 152 रनों का लक्ष्य मिला था, जो बड़ा तो कतई नहीं था लेकिन जोश में भारतीय खिलाड़ियों ने वो करके दिखाया, जो अनहोनी सा ही था। एक घंटे के खेल में आस्ट्रेलिया के तीन विकेट 18 रनों पर निकल चुके थे। दो विकेट करसन ने चटकाए तो एक दिलीप दोषी ने ले लिया। अगले दिन जब खेल शुरू हुआ तो हर भारतीय गेंदबाज कमाल दिखा रहा था-वो चाहे घावरी हों या फिर दोषी या कपिलदेव। वैसे पांचवां दिन कपिल का था, जिन्होंने 16 ओवरों में चार मेडन करते हुए केवल 28 रन देकर पांच विकेट झटके थे। क्या आप मानेंगे कि पहली बार आस्ट्रेलिया की धरती पर भारतीय टीम ने मेजबानों को ना केवल 83 रन पर समेटा बल्कि वो टेस्ट भी 59 रनों से जीता। मुझको ये टेस्ट आज भी नहीं भूलता है।
सौरव की टीम की खासियत और भारत के सबसे गजब के कप्तान बेदी के बारे में अगली बार चर्चा होगी। क्या गजब की टीमें थीं ये और क्या गजब के कैरेक्टर वाले क्रिकेटर थे उनके।
( वरिष्ठ पत्रकार संजय श्रीवास्तव की फेसबुक वाल से साभार)

 

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