सेमीफाइनल में मिताली को न खिलाने के पीछे अंदरूनी राजनीति भी संभव, इस बड़े विवाद की जांच जरूरी

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महिला टी-20 विश्व कप में पुरुष व महिला वर्ग में सबसे ज्यादा रन बनाने का अनुभव रखने वाली मिताली राज का मामला सोमवार को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की प्रशासनिक समिति (सीओए) के समक्ष पेश होना है। इस मामले में संभव है बोर्ड जांच के लिए कोई कमेटी बनाने के निर्देश दे। लेकिन इस विवाद को दूसरे चश्मे से भी देखने की जरूरत है, क्योंकि यह मात्र मिताली की फिटनेस के चलते उसे बेंच पर बैठाने का निर्णय नहीं लग रहा, बल्कि इसके पीछे टीम की अंदरूनी राजनीति की बू भी आ रही है।

टीम प्रबंधन और कप्तान हरमनप्रीत कौर इस टूर्नामेंट का अंत इतना विवादास्पद बना देंगी, इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। घुटने में तकलीफ से पहले पूर्व कप्तान ने अपने अंतिम दोनों लीग मैचों में पचासे जड़कर नॉक आउट मुकाबले के लिए अपनी तैयारियों को दिखा दिया था। लेकिन उनकी चोट ने अंतिम लीग मैच में टीम से बाहर बैठवा दिया। राहत की खबर इंग्लैण्ड के खिलाफ सेमीफाइनल से पहले आई जब उनको सेमीफाइनल के लिए फिट घोषित कर दिया गया। इसके बावजूद जब टॉस से पहले टीम की घोषणा में मिताली का नाम एकादश में नहीं नजर आया तो सभी चौंक गए।
इसी के बीच उनको बाहर बैठाए जाने को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। पूर्व क्रिकेटरों की इस पर बहस के दौरान ही लीग मैचों में शानदार प्रदर्शन करने वाली भारतीय टीम इंग्लैण्ड से हारकर खिताब की दौड़ से बाहर हो गई। महिलाओं के इस टूर्नामेंट में भारत ने अभी तक एक भी खिताब नहीं जीता है, इसलिए अब मिताली सेमीफाइनल न खिलाने के फैसले ने एक बड़े विवाद का रूप ले लिया।

यदि टीम जीत कर पहली बार फाइनल पहुंच जाती तो शायद यह विवाद इतना बड़ा नहीं होता। लेकिन भारत की हार ने इस प्रकरण का पोस्टमार्टम शुरू करवा दिया है। टीम के सूत्र बता रहे हैं कि पूर्व कप्तान मिताली राज और हरमनप्रीत कौर के बीच प्रोफेशनल संबंध बहुंत मधुर नहीं हैं। ड्रेसिंग रूम सूत्रों के मुताबिक मिताली का कद महिला क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर सरीखा हो चुका है, जबकि हरमनप्रीत टीम में उनकी मौजूदगी से खुद को सहज नहीं महसूस कर रही हैं। इस सूत्र की मानें तो एक गुट मिताली को इस तरह का झटका देकर संन्यास के लिए तैयार रहने का भी संकेत देना चाहता था लेकिन मैच हार जाने रणनीति फेल हो गई।

अब सवाल उठ रहे हैं और उनके जबाव भी तलाशे जा रहे हैं, मसलन टूर्नामेंट को जीतने के करीब पहुंचने के बाद मिताली को बाहर बैठाने का रिस्क क्यों लिया गया? इस फैसले के पीछे सिर्फ हरमनप्रीत कौर व कोच रमेश पवार थे या कोई तीसरा भी? यह भी कि जब एक दिन पहले मिताली को फिट घोषित कर दिया गया था और उनकी फॉर्म भी जबर्दस्त थी तब क्यों मैच के बाद उसकी खराब फिटनेस का तर्क दिया गया? और क्या सलेक्टर सुधा शाह की भी इस फैसले में सहमति थी ?

पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली ने इशारों ही इशारों में मिताली के साथ हुए अन्याय को गलत बता पूर्व कप्तान को अपना समर्थन दिया है। साथ ही टीम इंडिया के पूर्व कोच ग्रेग चैपल द्वारा उनके साथ किए गए बर्ताव की याद दिला मिताली के हालात से गुजरने के अपने दर्द को भी बयां किया है।

बहरहाल जो भी हो यह मामला यदि अंदरूनी राजनीति का है तो इसमें शामिल लोगों के खिलाफ क्रिकेट प्रेमियों का कड़ी कार्रवाई की उम्मीद करना गलत नहीं है, क्योंकि इस फैसले से मिताली का तो नुकसान हुआ ही है, पूरे देश का फाइनल पहुंचने का सपना भी टूटा है। यह मामला यूं भी हलका नहीं है, क्योंकि यदि आज इस पर पर्दा डाल दिया गया तो टीम के अंदर एक गलत परंपरा भी शुरू होने के खतरा भी पैदा हो जाएगा।

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