यूपीसीए : यह आलोचनाओं का असर है या पापों का प्रायश्चित ?

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साभार फाइल फोटो

कानपुर : इसे आलोचनाओं से पड़ा दबाव कह लीजिए या पिछले “पापों” का अहसास, इस बार यूपीसीए ने रणजी ट्रॉफी टीम का काफी हद तक ठीक चयन किया है। कुछ नामों पर ऐतराज हो सकता है लेकिन फिलहाल जो पाॅजिटिव हुआ उसी पर फोकस करते हैं।

खबर है कि यूपीसीए निदेशक राजीव शुक्ला विजय हजारे ट्रॉफी और महिला अंडर 19, टी-20 टीम में बाहरी हस्तक्षेप से खफा हैं। गनीमत रही टी-20 की टाॅप फाइव खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन कर टीम को फाइनल तक पहुंचा दिया है। अब सीनियर टीम का ट्रायल है। यहां चयनकर्ताओं को ध्यान रखना होगा कि टीम चयन से ही सीजन के रिजल्ट की महक मिल जाती है, इसलिए मिलावट से परहेज होगा, ऐसी उम्मीद रखनी चाहिये।

तो बात कर रहे थे नरम राजीव शुक्ला के थोड़ा कठोर होने की। विजय हजारे में मिली करारी हार के बाद उन्होंने अपने बेअंदाज पदाधिकारियों को कसा। चयनसमिति से किसी का दबाव न मानने को कहा है। संभवतः इसी वजह से चयनसमिति को कई वर्षों बाद अपनी पसंद की टीम उतारने का मौका मिला है।
यूपीसीए ने 2005 में लखनऊ में मोहम्मद कैफ की कप्तानी और कोच राजिन्दर सिंह हंस के बेहतरीन तालमेल के चलते बंगाल को हराकर पहली और अंतिम बार रणजी ट्रॉफी जीती थी। इसके बाद फिर कभी उसे वह सफलता नहीं मिली। पिछले कुछ सालों से तो टीम नॉक आउट में भी नहीं पहुंच पा रही है।आश्चर्यजनक यह है कि कैफ और हंस की सेवाएं यूपीसीए लेना नहीं चाहता।

विजय हजारे ट्रॉफी के लिए जब टीम का चयन किया गया तो रजत गोयल नाम का एक ऐसा खिलाड़ी भी खेल गया, जिसको कैम्प तक में नहीं चुना गया था। इसके अलावा कुछ अन्य सिफारिशी खिलाड़ी भी टूर्नामेंट खेल गए। इसका परिणाम यह निकला कि टीम ने टूर्नामेंट सैकेंड लास्ट की पोजीशन पर फिनिश किया।

रणजी में मोहम्मद इसरार को टीम में जगह न मिलना इस बात का सबूत है कि अकरम सैफी जिनको हाल ही में लोकपाल ने सभी आरोपों से बरी कर दिया है, ने भी टीम के चयन में कोई दखल नहीं दिया। अकरम दूसरी पारी में यदि यूपी क्रिकेट के हित में काम करते हैं तो अपने ऊपर लगे तमाम दाग कम से कम हल्के तो कर ही सकते हैं। यूपी क्रिकेट में यदि कुछ अच्छे के लिए बदल रहा है तो फिलहाल इस गहराई में जाने की भी जरूरत नहीं कि अकरम को कैसे क्लीन चिट मिली, कौन हैं यूपी के लोकपाल और राहुल शर्मा को क्यों हलफनामे के जरिए आरोप वापस लेने पड़े।

हालांकि कर्नल सीके नायडू ट्राॅफी की अंडर-23 टीम बहुत अच्छी नहीं बनी है। इसमें कुछ सिफारिशी चेहरे भी हैं, फिर भी संभावितों की जंबो सूची को देखते हुए टीम का चयन कुछ हद तक ही सही पर संतोषजनक कहा जा सकता है। यह अलग बात है कि पिछले से पिछले सत्र में दो मैचों में ही 17 विकेट लेने वाले लेफ्ट ऑर्म स्पिनर विशाल चौधरी को चयनकर्ताओं ने जगह नहीं दी। इसकी कोई वजह भी नहीं बताई गई।

यूपी की कुछ जूनियर टीमें भी अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। साफ है कि खूब फजीहत करवाने के बाद यूपीसीए को गल्तियों का एहसास होने लगा है और डैमेज कंट्रोल के लिए प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। हालांकि बीते कुछ सालों में गंगा से बहुत पानी बह चुका है। यानि इंडियन क्रिकेट के पावर हाउस में अब घुप्प अंधेरा है। यूपी क्रिकेट अर्श से फर्श पर आ गिरा है, दूसरी ओर अन्य छोटे-छोटे राज्यों की टीमें काफी आगे निकल चुकी हैं। नवागंतुक उत्तराखण्ड ने तो विजय हजारे ट्रॉफी में अपने पहले ही सीजन में शानदार प्रदर्शन से यूपीसीए सलेक्टरों की पोल खोल दी। बता दिया कि अब तक उनके साथ वे कैसा बर्ताव कर रहे थे। खैर!

यूपी की इससे बेहतर रणजी टीम चुने जाने की कल्पना इसलिए भी नहीं की जा सकती थी, क्योंकि अब यहां ज्यादा स्टफ है ही नहीं। स्टेट टीम में जगह बनाना पिछले कुछ सालों में काफी कठिन हो गया था। तरह-तरह के आरोप चयनकर्ताओं और खुद यूपीसीए कर्ताधर्ताओं पर लग रहे थे। हालात यह रहे कि पिछले सीजन तो विभिन्न एज ग्रुप टीमों में 30 या उससे भी ज्यादा खिलाड़ी खिला डाले गए। हर खिलाड़ी का कोटा फिक्स था कि किसको कितने मैचों में खेलना है। टैलेंट है या नहीं इससे किसी को कोई मतलब नहीं था। न इससे कोई सरोकार था कि टीम पर रेलीगेशन का खतरा मंडरा रहा है। लगभग हर फॉर्मेट की टीम में कुछ ऐसे खिलाड़ी भी साथ बने रहे जिनमें जरा भी दम नहीं था।

इसरार जैसे जुगाड़ू खिलाड़ी पर लगभग तीन साल यूपीसीए ने लाखों खर्च किए।
ऐसा नहीं कि दूसरे राज्यों में फेयर सलेक्शन होते हों और यूपी ही सबसे ज्यादा बदनाम हो। दरअसल हर राज्य में एक दो सिफारिशी खिलाड़ियों का कोटा रहता ही है, लेकिन उनकी सीमा 30 खिलाड़ियों तक ही रहती है। अंतिम 16 में कोई समझौता नहीं किया जाता है। यूपीसीए के पूर्व सचिव ज्योति बाजपेई के जमाने में भी सिफारिशें खूब चलती थीं लेकिन उनके साफ निर्देश थे कि कोई भी 16 की टीम में न घुसने पाए। शायद यही वजह रही कि तब यूपी देश के क्रिकेट का पावर हाउस कहलाने लगा था। कई खिलाड़ी इंडिया खेल रहे थे।

आज तो जो खिलाड़ी इस स्थिति में पहुंचता दिखता है, लगातार मौका न देकर उसकी फॉर्म ही बिगाड़ दी जाती है। परविन्दर सिंह, तन्मय श्रीवास्तव, अमित मिश्रा और अलमास शौकत इसके जीते जागते उदाहरण हैं। मोहम्मद कैफ, आरपी सिंह, पीयूष चावला को एक तरह से मजबूर कर दिया गया स्टेट छोड़ने के लिए। प्रवीण कुमार जैसे स्विंग के किंग तक को रिटायरमेंट मैच नहीं दिया गया। सीनियरों के साथ अपमानजनक रवैया आखिरकार यूपी क्रिकेट के पतन का मुख्य कारण बना।

अब कोई ऐसा नजर नहीं आ रहा, जिसको इंडियन टीम के लिए दावेदार माना जा सके। दरअसल पिछले कुछ सालों में क्रिकेट की नसों में करप्शन को इतना इंजेंक्ट किया गया कि अच्छी खासी टीम पंगु हो गई। ऐसे में यहां का टैलेंटेंड गरीब क्रिकेटर हताश हो गया। कई खिलाड़ी प्रदेश छोड़ चुके हैं और कई को छोड़ने को मजबूर कर दिया गया है। तन्मय श्रीवास्तव जैसे बल्लेबाजों को कोचिंग के कोर्स करवाकर टीम में उनके लिए दरवाजे बंद कर दिए गए।

इस बार सबसे बेहतर उपलब्ध टीम चुनी लेकिन यह टीम भी इस सीजन कितनी दूर तक सफर करेगी, इस बारे में खुद सलेक्टर भी कोई दावा करने को तैयार नहीं। फिर भी यदि कई साल बाद गल्तियों का प्रायश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है तो यह यूपी क्रिकेट के लिए शुभ संकेत हैं। बशर्ते टीम में फिर बाहर से घुसपैठ न हो।

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