कहीं यह विरोध इस युवा क्रिकेटर का कॅरियर ही न खत्म कर दे

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साभार फाइल फोटो

कानपुर : यूपी में खिलाड़ियों के साथ होने वाले खिलवाड़ के खिलाफ यूं तो कोई आवाज नहीं उठाता और यदि उठाता है तो क्रिकेट माफिया उसके कॅरियर की कूंच कूंच कर हत्या कर देते हैं। डर है कि युवा और टैलेंटेड क्रिकेटर त्रिवेश यादव के साथ भी कहीं ऐसा ही न हो।
कूच बिहार चैम्पियन टीम के इस खिलाड़ी के पूरे टूर्नामेंट में प्लेइंग इलेवन का हिस्सा न बन पाने की कुछ क्रिकेटीय वजहें हो सकती हैं लेकिन टूर्नामेंट की फाइनल सूची में उसका नाम न होने से यह स्पष्ट हो गया कि यूपीसीए कुछ खिलाड़ियों को सिर्फ घूमने के लिए टीम के साथ भेज देता है। ये ड्रेसिंग रूम से बाहर सिर्फ ग्रुप फोटोग्राफी करवाने को ही निकलते हैं। कौन इनका एयर टिकट, होटल और खाने का खर्च उठाता है यह तफ्तीश का विषय है।
त्रिवेश यादव का मामला भी यूपीसीए के उस करपशन की नियमित प्रक्रिया का हिस्सा रहा जिसमें खिलाड़ी का शोषण तो होता है लेकिन टीम के साथ घूमने के लालच, टीम के साथ भेजने वालों के एहसान तले दबे होने और भविष्य की संभावनों को जिंदा रखने के लिए टूरिस्ट खिलाड़ी कभी विरोध नहीं कर पाता।

साभार फाइल फोटो

लेकिन त्रिवेश के मामले में ऐसा नहीं हुआ। अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि और दूसरों को न्याय दिलाने वाले पिता ने जब अपने ही पुत्र के साथ अन्याय होते देखा तो वह चुप न बैठ सके। लेकिन क्या अब यूपीसीए में चोरी चुपके जम्बो दल ले जाने का चलन खत्म हो जाएगा ? यह बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि त्रिवेश का केस अपने मुकाम तक पहुंच पाता है या नहीं।

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दरअसल कुछ हजार रुपये की धनराशि दबाने का जो विरोध दिख रहा है वैसा है नहीं। विरोध यूपी क्रिकेट के उस करपशन का है जिसमें सिफारिशी खिलाड़ियों को प्लेइंग इलेवन में मौका देने के लिए टैलेंटेड खिलाड़ियों को पानी की बोतल और तौलिया ले जाने के काम पर लगा दिया जाता है। ये बेचारे यदि टीम चैम्पियन बन जाती है तो ट्राॅफी के साथ फोटो खिंचवाकर ही अपना दिल भर लेते हैं।
पिछले कुछ महीनों में शोषित खिलाड़ियों के लिए आवाज उठने से यूपीसीए के करपशन पर थोड़ा अंकुश जरूर लगा है फिर चाहे वह राहुल शर्मा जैसे खिलाड़ी हों या खिलाड़ियों के हक में आवाज उठाने वाले अनुराग मिश्रा हों या फिर किसी खिलाड़ी के अभिभावक। लेकिन एक कहावत है कि चोर चोरी से जाए हेराफेरी से न जाए, सो दागियों ने काम करने के अपने तरीके भर बदले हैं। उनकी दुकानों के शटर अभी नहीं गिरे हैं। ऐसे में अब वे कोच और मैनेजर भी क्रिकेट करपशन का हिस्सा बन गए हैं जिनकी छवि कुछ समय पहले तक साफ सुथरी हुआ करती थी। अफसोस यह कि जिनके हाथ भविष्य में क्रिकेट की बागडोर रहनी है, उनको अभी से भ्रष्टाचार की अफीम चटाई जा रही है। लेकिन इस बीच सुखद संकेत यह भी हैं कि अब लोग गड़बड़ियों का विरोध करने की हिम्मत जुटाने लगे हैं। कुछ लोग इस करेप्ट सिस्टम के खिलाफ लड़ाई के लिए चुपचाप साक्ष्य भी जुटा रहे हैं। आज नहीं तो भविष्य में कुछ ऐसे खुलासे जरूर होंगे जो यूपी क्रिकेट को निर्णायक दिशा दे सकते हैं।

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